Wednesday, January 4, 2017

भोपाल एनकाउंटर : सवाल दर सवाल


जावेद अनीस

इस देश में एनकाउंटर का स्याह इतिहास है और इसको लेकर हमेशा से ही विवाद रहा है. आम तौर पर एनकाउंटर के साथ फर्जी शब्द जरूर जुड़ता है. मध्यप्रदेश के 61वें स्थापना दिवस से ठीक एक दिन पहले यहाँ भी एक ऐसा ही एनकाउंटर हुआ है जो अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया है. आईएसओ प्रमाणित भोपाल सेंट्रल जेल में बंद प्रतिबंधित स्टुडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया के आठ संदिग्ध फरार हुए और फिर उनका एनकाउंटर कर दिया गया, उसके बाद से इसको लेकर मंत्रियों, अधिकारियों के बयान आपस में मेल नहीं खा रहे हैं और जो वीडियो सामने आये हैं वो भी कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं.

एनकाउंटर में मारे गये आठों विचाराधीन कैदियों पर सिमीसे जुड़े होने सहित देशद्रोह, बम धमाकों में शामिल होने जैसे कई आरोप थे. जेल प्रशासन के मुताबिक ये आठों 31 अक्टूबर की रात जेल की बीस फीट ऊंची दीवार फांद कर भागे थे. भागने के दौरान उन्होंने एक पुलिस कांस्टेबल की हत्या भी कर दी. इस तरह से इस घटनाक्रम में कुल नौ लोग मारे गये हैं. मारे गये आठ विचाराधीन कैदियों में से तीन तो 2013 में मध्य प्रदेश के ही खंडवा जेल से भी फरार हो चुके थे. जिन्हें दोबारा पकड़ कर सेंट्रल जेल में शिफ्ट कर दिया गया था. हालांकि मध्यप्रदेश सरकार इस एनकाउंटर को अपनी उपलब्धि बताते हुए नहीं थक रही है. लेकिन कई ऐसे सवाल है जिनका उसे जवाब देना बाकी है.    

सवाल दर सवाल 

सिमी संदिग्धों के जेल से भागने और उनके एनकाउंटर को लेकर विपक्ष, मानव अधिकार संघटनों और मीडिया द्वारा कई सवाल खड़े किए गये हैं.
घटना की कवरेज करने वाले जी मीडिया के पत्रकार प्रवीण दुबे ने एनकाउंटर पर बहुत ही गंभीर सवाल उठाये हैं. अपने फेसबुक वॉल पर उन्होंने जो लिखा उसका कुछ अंश इस तरह से है शिवराज जी, इस सिमी के कथित आतंकवादियों के एनकाउंटर पर कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है. मैं खुद मौके पर मौजूद था, सबसे पहले 5 किलोमीटर पैदल चलकर उस पहाड़ी पर पहुंचाजहां उनकी लाशें थीं. लेकिन सर इनको जिंदा क्यों नहीं पकड़ा गयामेरी एटीएस चीफ संजीव शमी से वहीं मौके पर बात हुई और मैंने पूछा कि क्यों सरेंडर कराने के बजाय सीधे मार दियाउनका जवाब था कि वे भागने की कोशिश कर रहे थे और काबू में नहीं आ रहे थेजबकि पहाड़ी के जिस छोर पर उनकी बॉडी मिलीवहां से वो एक कदम भी आगे जाते तो सैकड़ों फीट नीचे गिरकर भी मर सकते थे. मैंने खुद अपनी एक जोड़ी नंगी आँखों से आपकी फ़ोर्स को इनके मारे जाने के बाद हवाई फायर करते देखाताकि खाली कारतूस के खोखे कहानी के किरदार बन सकें. उनको जिंदा पकड़ना तो आसान था फिर भी उन्हें सीधा मार दिया और तो और जिसके शरीर में थोड़ी सी भी जुंबिश दिखी उसे फिर गोली मारी गई एकाध को तो जिंदा पकड लेते. उनसे मोटिव तो पूछा जाना चाहिए था कि वो जेल से कौन सी बड़ी वारदात को अंजाम देने के लिए भागे थे”?
इसी तरह वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता अवधेश भार्गव ने तो इस एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए जबलपुर हाईकोर्ट में एक याचिका करते हुए सवाल उठाया है कि आरोपियों के सेल में ही लगे सीसीटीवी कैमरे खराब क्यों थे? जेल में कैदियों को दो से ज्यादा चादर नहीं दिए जाते हैं ऐसे में आरोपियों के पास जेल की दीवार कूद कर फरार होने के लिए 35 चादरें कहां से आई और जेल के मेन गेट पर लगे सीसीटीवी कैमरे को जांच में शामिल क्यों नही किया गया.
रिहाई मंच ने इस पूरे मामले पर सवाल उठाते हुए बयान जारी किया कि ठीक इसी तरह अहमदबाद की जेल में थालीचम्मचटूथ ब्रश जैसे औजारों से 120 फुट लंबी सुरंग खोदने का दावा किया गया था.

सीपीआई के राज्य सचिव बादल सरोज का बयान आया कि  “भोपाल की एक अति-सुरक्षित जेल से आठ विचाराधीन-अंडरट्रायल-मुजरिमों के फरार हो जानेउसके बाद उनके एक साथ टहलते हुए अचारपुरा के जंगल में मिलने और "मुठभेड़" में मारे जाने की घटना एक अत्यंत फूहड़ तरीके से गढी गयी कहानी प्रतीत होती है. यह जितनी जानकारी देती है उससे अनेक गुना सवाल छोड़कर जाती है.”
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से सोशल मीडिया पर एक तस्वीर शेयर करते हुए लिखा कि “मुझे किसी ने यह चित्र भेजा है जिसमें एनकाउंटर में मरने वाला और मारने वाले के जूते एक समान हैं क्या संयोग है.
सबसे बड़ा सवाल यह है  इतने बड़े जेल से गंभीर मामलों के आरोपी जिन्हें “दुर्दांत आतंकवादी” बताया जा रहा था इस तरह आसानी जेल से भागने में सफल कैसे हो गयेबताया जा रहा है कि वहां “35 आतंकवादीरखे गये थे फिर जेल की सुरक्षा 2 सिपाहियों के भरोसे कैसे छोड़ दी गई? जेल का सीसीटीवी फुटेज कहां है? और जेल के 42 सीसीटीवी कैमरों में से ठीक वही 4 कैमरे कैसे खराब हो गये तो  फरार कैदियों  के बैरक के सामने लगे थे ? जेल से फरार होने के बाद उनके पास नए जींस, टी-शर्ट, जूतेजीपीएस वॉच और ड्राई फ्रूट्स कैसे आए ? जेल से फरार होने के बाद आठों कैदी एक साथ एक ही दिशा में क्यों भागे और सात-आठ घंटे पैदल चलकर जेल से 15 किलोमीटर दूर ईंटखेड़ी की पहाड़ी पर क्यों गये जहाँ से आगे कोई रास्ता ही नहीं जाता है ? क्या जेल से भागने के बाद वे शहर छोड़ने की बजाए वहां रुककर पुलिस का इंतजार रहे थे?


इसी तरह से मध्यप्रदेश के गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह ने दावा किया गया था कि एनकाउंटर के दौरान आरोपी हथियारों से लैस थे. जबकि सूबे के एटीस चीफ का बयान ठीक इसके उल्टा था जिनका कहना था कि उनके पास कोई हथियार नहीं थे. जो वीडियो वायरल हुए हैं उसमें भी नजर आ रहा है कि सभी आरोपी निहत्थे हैं.

दूसरा सवाल मुठभेड़ को लेकर सुनायी गयी अलग-अलग कहानियों पर हैं जिसमें से कई बचकानी हैं. पुलिस के अनुसार आरोपियों ने जेल से फरार होने के लिए रोटियों का सहारा लिया. वे भोजन में अतिरिक्त रोटी मांगते थे ऐसा उन्होंने 40 दिनों तक किया. इन रोटियों को वे खाने के बजाय सूखा कर रख लेते थे इन्हीं रोटियों को जलाकर उन्होंने प्लास्टिक की टूथब्रश से ऐसी चाभी बना डाली जिससे ताला खोला जा सके. उस रात ताला खोलने के बाद उन्होंने वहां तैनात सिपाही रमाशंकर यादव की गला रेतकर हत्या की और दूसरे सिपाही चंदन सिंह के हाथ-पैर बांध दिए, फिर चादरों को रस्सी की तरह इस्तेमाल कर 25 फीट ऊंची दीवार फांद कर भाग गए.

 
जाहिर है इस कहानी से मुतमइन हो जाना आसान नहीं  है. दूसरी तरफ एनकाउंटर को लेकर जो वीडियो सामने आए हैं वे भी कुछ और ही कहानी बयान करते हैं. सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में दिख रहा है कि फरार आतंकी सरेंडर करना चाहते थे लेकिन पुलिस ने उन्हें इसका मौका ही नहीं दिया. एक दूसरे वीडियो के मुताबिक एनकाउंटर में पुलिसवाला एक घायल कैदी को निशाना बनाकर फायरिंग कर रहा है.

एनकाउंटर के बाद जिस तरह से पोस्टमार्टम किया गया है उस पर भी सवाल उठे हैं बताया जा रहा है कि आठों आरोपियों का पोस्टमार्टम मेडिको लीगल इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. अशोक शर्मा द्वारा चार घंटे में अकेले ही पूरा कर लिया किया गया जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि एक सामान्य पोस्टमार्टम करने में भी 45 मिनिट से 1 घंटे लग जाते हैं. पोस्टमार्टम के दौरान ना तो वहा कोई फोरंसिक विशेषज्ञ मौजूदा था और ना ही अदालत को इसकी सूचना दी गयी. जबकि कैदी न्यायिक अभिरक्षा में थे और प्रावधानों के अनुसार शव परीक्षण से पहले अधिकृत न्यायिक मजिस्टे्ट को सूचना दिया जाना चाहिए था.

डॉ शर्मा द्वारा बार-बार बयान बदलने की वजह से भी पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर सवाल उठ रहे हैं जैसे कि पहले उन्होंने बताया था कि “आरोपियों ने अपना आखरी भोजन 10 बजे रात (घटना के 4 घंटे पहले) के करीब लिया था.” लेकिन बाद में डॉ शर्मा ने अपना बयान बदलते हुए कहा कि “आरोपियों द्वारा अपना आखरी भोजन शाम 7 लेने की सम्भावना है.” मालूम हो कि भोपाल सेन्ट्रल जेल में कैदियों को शाम 6.30 बजे भोजन दे दिया जाता है. इसी तरह से पहले डॉ. शर्मा द्वारा बताया गया था कि चार आरोपियों के शरीर से गोली पायी गयी है जबकि चार अन्य के शरीर से गोली आर पार निकल गयी है. जिसका मतलब ये है कि इन चारों को बहुत करीब से गोली मारी गयी है. जब इस पर सवाल उठने लगे तो डॉ. शर्मा ने पलटते हुए कहा कि कि वे पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि उन्हें करीब से गोली मारी गयी थी या दूर से.

सरकार की तरफ इस मुठभेड़ में तीन पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात भी कही गई थी और बताया गया था कि मुठभेड़ के दौरान इन तीनों पुलिसकर्मियों को धारदार हथियार से हुए हमले में हाथों और पैरों पर चोटें आई हैं. लेकिन 11 नवम्बर 2016 को अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक खबर के अनुसार अनुसार उन तीनों में कोई भी पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल नहीं हुआ था. एक पुलिसकर्मी की पत्नी ने बताया है कि “कैदियों का पीछा करते हुए चोटिल हो गए थे उनकी कोहनी छिल गई थी जिसका कारण जमीन उबड़-खाबड़ होना था.” इसी तरह से एक दूसरे पुलिसकर्मी के भाई द्वारा बताया गया है कि “उनके भाई को हथेलियों में चोट लगी है लेकिन यह गंभीर नहीं है.” उन्होंने चोट लगने के कारणों के बारे में जानकारी होने से भी इनकार किया. अखबार के मुताबिक एक पुलिसकर्मी तो 31 अक्टूबर को हुई उस मुठभेड़ के बाद से लगातार ड्यूटी पर जा रहा है.


सारे सबूत मिटा दो ?

भोपाल से लगे मनीखेड़ी पहाड़ी पर एनकाउंटर के बाद वहां सबूतों को सुरक्षित रखने में कोई रूचि नहीं दिखाई गयी और ऐसा लगता है इस मामले में पुलिस और प्रशासन द्वारा जानबूझ कर लापरवाही की गयी है. एनकाउंटर के बाद घटना स्थल को पूरी तरह से खुला छोड़ दिया गया जहाँ लोग पिकनिक स्पॉट की तरह घूमते और फोटो खिंचवाते नजर आ रहे थे. वहां सबूतों की हिफाजत के लिए कोई भी सुरक्षाकर्मी नजर नहीं आया. जबकि इतने सवाल उठने के बाद यह सुनिश्चित करना जरूरी था कि घटना स्थल पर सभी सबूत महफूज रहे. जिससे आगे जांच करने वालों को आसानी हो सके.
जाँच से पहले इनाम की घोषणा

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घटना के अगले दिन एक नवंबर को प्रदेश के स्थापना दिवस समारोह में पूरे घटनाक्रम में अहम भूमिका निभाने वाले पुलिस के अधिकारियोंसिपाहियों को सम्मानित किया और आननफानन में इस मुठभेड़ में भाग लेने वाले प्रत्येक जवान को दो लाख रूपये, सर्चिंग में शामिल जवान को एक लाख रूपये और पुलिस का सहयोग करने वाले नागरिकों को भी 40 लाख रूपये देने की घोषणा कर  दी. जबकि मामले की जांच शुरू भी नहीं हुई थी. यह एक तरह से इस विवादित एनकाउंटर पर उनकी मोहर थी. बाद में सरकार को अपने इस फैसले पर रोक लगाना पड़ा क्योंकि खुद शिवराज सरकार इस मामले की जांच करवा रही है और जांच पूरी होने तक सरकार द्वारा इस मामले में किसी को पुरस्कार नहीं दिया जा सकता है.

इस पूरे प्रकरण से सवाल उठता है कि जिस सरकार का मुखिया मुठभेड़ को पहले से ही सही मान कर इसमें शामिल लोगों को इनाम देने की घोषणायें कर रहा हो वह इसकी जांच किस तरह से कराएगी ?

कोर्ट की फटकारा

भोपाल मुठभेड़ को लेकर कोर्ट ने मध्यप्रदेश सरकार को फटकार लगायी है. भोपाल कोर्ट का कहना था कि सरकार द्वारा नौ दिन बाद उसे आधिकारिक तौर पर इस एनकाउंटर की जानकारी दी गयीजबकि इसमें मारे गए लोग न्यायिक हिरासत में थे और क़ानूनन इसके बारे में कोर्ट को तुरन्त बताया जाना चाहिए था. कोर्ट का यह भी कहना था कि आरोपियों का पोस्टमार्टम भी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष नहीं कराया जो कानूनी प्रावधानों को उल्लंघन है. इसी तरह से कोर्ट ने एनकाउंटर के स्थान को सील नहीं करने पर भी सवाल उठाये.
हालांकि मप्र हाईकोर्ट ने पत्रकार अवधेश भार्गव द्वारा भोपाल में मुठभेड़ में मारे गये 8 आरोपियों की उच्च स्तरीय जांच कराए जाने की जनहित याचिका को खारिज करते हुए राज्य सरकार द्वारा जांच को लेकर की गई कार्रवाई को उचित बताया है और इस मामले में कोई भी निर्देश जारी करने से इंकार कर दिया है.

शिवराज का मेकओवर ?

मध्यप्रदेश स्थापना दिवस समारोह के एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भीड़ से पूछते हैं कि पुलिस ने आतंकियों को मारकर सही किया या गलत ?जवाब में वहां मौजूद भीड़ हाथ उठाकर कहती है सही किया.यह शिवराज सिंह का स्टाइल नहीं है. वे भाजपा के नर्म चेहरे माने जाते रहे हैं और संघ के हिन्दुत्वादी ऐजेंडे को लागू करने में बहुत बारीकी बरतते है.
लेकिन शिवराज यहीं नहीं रुके इसके बाद उनका बयान आता है कि "कई साल तक वे जेल में बैठकर चिकन बिरयानी खाते हैं. फिर फरार हो जाते हैं."  हालांकि कई सालों से मध्यप्रदेश की जेलों में बंद कैदियों को शाकाहारी खाना ही उपलब्‍ध कराया जाता है और यहाँ प्रतिदिन एक कैदी के भोजन पर 50 रूपये खर्च किया जाता है. जाहिर सी बात है एक दिन के इस बजट में बिरयानी नहीं खिलाया जा सकता है. भयानक कुपोषण का मार झेल रहे जिस सूबे की सरकार आंगनवाडी केन्द्रों में कुपोषित बच्चों को अंडे नहीं खिला सकती तो वह जेलों में बंद कैदियों को चिकन बिरयानी कैसे खिला सकती है.

दरअसल बिरयानी का जिक्र करके शिवराज सिंह चौहान बहुत ही आक्रमकता के साथ एनकाउंटर को सही ठहराने की कोशिश कर रहे थे. इस कोशिश में खुद को अपनी नर्म छवि से बाहर निकालने की कवायद भी शामिल है. आखिरकार शिवराजसिंह छवि बदल कर क्या क्या हासिल करना चाहते हैं? क्या अगले विधानसभा चुनाव के लिए वे अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं या उनकी निगाहें कहीं और है ?

पुराना है सिमी का भूत

1977 में गठित 'स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया(सिमी) पर वर्ष 2001 में प्रतिबंध लगा दिया गया था. जिसके बाद से मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में मुस्लिम नौजवानों को सिमी से जुड़े होने के आरोप में गिरफ्तार किया जा चूका है. जामिया टीचर्स सॉलिडेरिटी एसोसिएशन द्वारा 2013 में गिल्ट बाय एसोसिएशननाम से एक रिपोर्ट जारी की गयी थी जिसमें बताया गया था कि मध्यप्रदेश में साल 2001 और 2012 के बीच “अनधिकृत गतिविधि अधिनियम” (UAPA) के तहत कायम किये गए करीब 75  मुक़दमों की पड़ताल की गयी है जिसके तहत 200 से ज्यादा मुस्लिम नौजवान आतंकवाद के इल्जाम में मध्यप्रदेश के विभिन्न जेलों में बंद हैं. इनमें से 85 के खिलाफ  अनधिकृत गतिविधि अधिनियम” (UAPA) के तहत मामले दर्ज किये गये हैं. इन पर आरोप है कि ये सिमी के कार्यकता हैं. रिपोर्ट के अनुसार इन आरोपियों पर किसी भी तरह के आतंकवादी हमले का इल्जाम नहीं है और ज्यादातर एफ.आई.आर. में जो आरोप लगाये गये हैं उसमें काफी समानता है जैसे पुलिस की छापे मारी के दौरान आरोपियों के पास से सिमी का साहित्य, पोस्टर, पम्पलेट बरामद हुए हैं (लेकिन जिस लिटरेचर की बात की गयी है वो सिमी के पाबन्दी से पहले की है) या मुल्ज़िम चौक-चौराहे और दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर खड़े होकर प्रतिबंधित संगठन सिमी के पक्ष में नारे लगा रहे थे और बयानबाज़ी करते हुए यह प्रण ले रहे थे कि वो संगठन के उद्देश्य को आगे बढ़ायेंगे. यहाँ तक कि कई मामलों में तो अखबारों में प्रकाशित सिमी से जुड़ी ख़बरों को भी आधार बनाया गया है जैसे अगर सिमी से सम्बंधित अखबारों में प्रकाशित खबरें किसी आरोपी के यहाँ मिली है तो उसे भी सबूत के तौर पर रखा गया है. जाहिर हैं रिपोर्ट तथ्यों के साथ बताती है कि कैसे इन मामलों में हल्के सबूतों और कानूनी प्रक्रियाओं के घोर उलंघन किया गया है.
सुप्रीम कोर्ट ने 3 फरवरी 2011 को दिए गए अपने लैंडमार्क आदेश में कहा था कि केवल प्रतिबंधित संगठन की सदस्यता किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं साबित करती. मध्यप्रदेश में सिमी से जुड़े होने के करीब दो दर्जन आरोपी इसी आधार पर बरी किये जा चुके हैं. भोपाल मुठभेड़ में मारे गए आरोपियों में से कई के मामलों में भी अदालत ने सबूतों को अविश्वसनीय बताया था और इनके जल्द ही बरी होने की सम्भावना थी.   

फैसला सुनाने की जल्दी

हमारे देश में अंडरट्रायल कैदी को आतंकवादी बता देना बहुत आम है और अगर मामला अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों से जुड़ा हो तो कोई इंतजार नहीं करता कि अपराध सिद्ध हुआ है कि नहीं हर कोई जज बन कर फैसला देने लगता. इस मामले में मीडिया सबसे आगे हैं. ऐसे कई मामले सामने आये हैं जहाँ मुस्लिम नौजवान कई सालों तक जेल की सजाकाटने के बाद निर्दोष साबित हुए है लेकिन इस दौरान उन्हें आतंकी ही बताया जाता रहा. मारे गये आठ लोगों पर भी सिमी से जुड़े होने का आरोप था जिसे साबित किया जाना बाकी था. लेकिन मुठभेड़ के बाद भी हमारा मीडिया इन्हें आतंकवादी लिखता और दिखाता रहा. भोपाल लाल परेड ग्राउंड पर मुख्यमंत्री ने भी इन्हें आतंकवादी बताया था.जबकि मध्यप्रदेश सरकार द्वारा न्यायिक जांच का जो लिखित आदेश दिया है उसमें आतंकवादी शब्द की जगह अंडरट्रायल का उपयोग किया गया है. जाहिर हैं यहाँ मामला कोर्ट और कानून से जुड़ा हुआ था इसलिए यहाँ वही लोग अंडरट्रायल हो गये जिन्हें सरकार के मुखिया से लेकर तमाम मीडिया वाले आतंकवादी बता रहे थे.

सवाल करना है मना है

इन दिनों देश की आबो-हवा बदली सी है, सरकार के हर फैसले को देशभक्ति और सवालों या आलोचना को देशद्रोह करार दिया जा रहा है.हालत यह है कि भगवा खेमे के पत्रकार और दैनिक 'नयाइंडिया' के सम्पादक हरि शंकर व्यास जैसे लोगों तक को कहना पड़ रहा है कि मैं हिन्दू राष्ट्रवादी हूँ, फिर भी कहता हूँ कि मोदी राम की नहीं रावण की दिशा में चल रहे हैं.उन्हें भी लोगों के जुबान बंद और हवा में पसरा हुआ भय दिखाई पड़ रहा है.

भोपाल एनकाउंटर को लेकर इतने सारे सवाल है और यह एक तरह से इन्साफ के लिए कानूनी प्रक्रियाओं और नागिरकों के जीने के अधिकार से जुड़ा हुआ है. इसके बावजूद भी हुक्मरानों ने सवाल उठाने वालों को नसीहतें दी हैं. सबसे खुला फरमान केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरेन रिजिजू का है जिसमें उन्होंने कहा है कि पुलिस पर सवाल उठाना और संदेह करना बंद होना चाहिए”. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की नसीहत थी कि कि जो लोग इस एनकाउंटर पर सवाल खड़े कर रहे हैं उन्हेंमारे गए पुलिसकर्मी के लिए भी दो शब्द बोलने चाहिए.

मामला फरमान और नसीहत तक ही नहीं सीमित रहा बल्कि सवाल उठाने वालों को सबक भी सिखाया गया. लखनऊ में मुठभेड़ के खिलाफ रिहाई मंच के धरने के दौरान मंच के महासचिव और अन्य कार्यकर्ताओं की पुलिस द्वारा जमकर पिटाई की गयी.इंदौर में भी एनकाउंटर के खिलाफ विरोध जताने और अपनी मांग रखने वाले नागरिक समूह को कार्यक्रम करने नहीं दिया गया और कार्यक्रम से पहले नजरबन्द कर दिया गया.
   
जांच जारी है

इस मामले की जांच पहले एनआईए द्वारा कराये जाने की बात की गयी थी लेकिन बाद में सरकार इससे पीछे हट गई और अब न्यायिक जांच के आदेश देते हुए एक-सदस्यीय जाँच आयोग गठित कर दी गयी है जिसकी अध्यक्षता उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री एस.के. पाण्डे कर रहे हैं.  जाँच आयोग को 3 माह के भीतर जाँच पूरी करके अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रस्तुत करनी है. आयोग की जांच के तीन प्रमुख बिंदु हैं.

·        विचाराधीन बंदी किन परिस्थितियों एवं घटनाक्रम में जेल से फरार हुए? उक्त घटना के लिये कौन अधिकारी एवं कर्मचारी उत्तरदायी हैं?
·        पुलिस मुठभेड़ और विचाराधीन कैदियों की मृत्यु किन परिस्थितियों एवं घटनाक्रम में हुई?
·        क्या मुठभेड़ में पुलिस द्वारा की गयी कार्यवाही उन परिस्थितियों में सही थी ?   

लेकिन आरोपियों के वकील ने इस एनकाउंटर की न्यायिक जाँच रिटायर से कराए जाने के सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा है कि “आरोप राज्य सरकार पर है और वो हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश से परामर्श लिए बिना एक रिटायर्ड जज से न्यायिक जाँच कराने की घोषणा कैसे कर सकती है?”. उन्होंने इस मामले की जांच एक सिटिंग जज से करने की मांग थी. इस सम्बन्ध में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की गयी थी जिसमें मांग की गई थी कि राज्य सरकार द्वारा हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में बनाई गई एक सदस्यीय जांच सीमित से कराने के बजाए एनकाउंटर की जांच हाईकोर्ट की सिंटिंग जज द्वारा कराई जाए. लेकिन हाईकोर्ट द्वारा इस याचिका ख़ारिज कर  दिया गया.


हर एनकाउंटर एक सवाल है और भोपाल एनकाउंटर का पूरा मामला ही सवालों का ढेर है. यह एक गंभीर मामला है जहाँ नागिरकों को सुरक्षा देने के लिए जवाबदेह सरकार और पुलिस-प्रशासन ही सवालों के घेरे में हैं. सरकार और मीडिया द्वारा जिस तरह से इस  एनकाउंटर का उत्सव मनाया गया था उससे इस बात की उम्मीद बहुत कम है कि इन सवालों के जवाब कभी बाहर आ पायेंगें. क्योंकि जिन्हें जवाब देना था वे अपना फैसला पहले ही सुना चुके हैं अब वही जांच भी करा रहे हैं . 
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(समकालीन तीसरी दुनिया (अक्‍टूबर-दिसंबर 2016)  में प्रकाशित) 

Forced Demonetisation and Cashlessness by Fiat: Creeping Fascism and its Popular Ideological Receptacles


Sanjay Kumar

The withdrawal of eighty six percent of currency notes by the Modi government has been an administrative fiasco. It is clear that little economic thought, and only a political urge has gone into the exercise. Informal sector of the economy, which accounts for 80% of the employment and 40% of the national output, has suffered short to medium term damage. All cash dependent transactions, wages, wholesale and retail trade, agricultural purchase and sale, are at a crawl. Workers are not getting wages, factories are closing, mandis are empty. Crores of young and old working people are spending hours in queues at banks and ATMs to withdraw their own money now gone scarce.  Press reports count more than eighty deaths. Parliament of the country is in a limbo, because the prime minister thinks it below his worth to reply to charges by the opposition party MPs. While the ordinary people are suffering, the Nero like rulers are trumpeting the arrival of the nirvana of a cash less economy as the answer to India's economic ills.

Even while Mr Modi's government is solely responsible for this needless and widespread suffering, it would be naive to expect an automatic popular backlash against it. The politics of the ruling party does not fit into the patronage or identity driven models of its competitors that draw popular support on the basis of expected returns. Its closest template is fascist politics, which  is a very particular kind of authoritarianism. What distinguishes a fascist regime from other modern authoritarian regimes like military dictatorships is the popular support it is able to garner for its policies and depredations. Fascism is a leadership driven politics. Its agendas are set by the leadership, they are not a response to popular demands and expectations. Nevertheless, fascism generates popular appeal by carefully working upon popular anxieties, prejudices, desires and fears, and refashioning them as grounds for aggression against selected minorities, and a belief in an imminent deliverance under the personalised rule of a leader. Fascism is marriage of demagoguery with powers of the modern state, which make it different from other forms of right wing populism. It also should not be confused with orthodox conservatism. It is a blatant dance of state power, which hides its brutalities by invocation of novelty and a continuous disruption of what society has come to accept as normal. It is the spectacle of fast change, which disorients people and encourages them to willfully suspend every day rules of judging right from the wrong, and truth from falsehood. Many elements of fascist template are visible in the ruling party discourse on demonetisation: the shock and awe of sudden announcement by the PM himself in a national broadcast at TV prime time, praise for the 'broad shoulders' of a courageous and decisive leader (as the finance minister put it in a speech recently), a 'new normal' that will deliver Indians from the seventy year old evil of black money, etc.

A common conceptual mistake is to limit analysis of fascism to explaining what it does.  What gives it popular appeal are not its actions per se, but the way the fascist discourse draws upon already present elements of popular ideologies. The 'banality of (fascist) Evil', as Hannah Arendt called it, appears striking only as long as it is seen as the result of a political event, rather than an ongoing socio-political process. In the Indian context, an uncritical acceptance of communalism, casteism, patriarchy and national chauvinism as parts of everyday common sense of Indians have formed the ideological support base for the RSS work over decades. Anti fascist democratic forces have rightly attempted to counter these by directly challenging them, and by drawing upon the other inclusive elements of popular ideologies. Fascism, however is also fed by ideologies about state and economy. These have remained outside the radar of democratic forces so far. The discourse and politics over the recent demonetisation open up a window to the latter. Many of the elements of popular ideologies used by Modi government to create support are an enduring feature of Indian political formation, used by other political forces too. Anti fascist democratic forces need to identify and challenge these roots urgently.   

Another common misunderstanding is that a regime can be fascist only if it indulges in large scale violence and violation of citizens' rights.  This understanding takes state violence, which all states indulge in more or less, as a defining property of fascism, rather than one of the elements of its political character. The actual violence of fascism depends on the degree of crises faced by the status quo in the society, and strength of its political opponents. Nor can the arrival of fascism be dated with the electoral success of a party, or a leader. It is more fruitful to look at it as a socio-political process driven by specific parties and leaders. Success of a fascist politics should be seen in the direction it is able to give to the character of state power, and how deeply it is able to manage popular support for its programme.

The Artful Irrational: There were no economic reasons to withdraw currency at the scale done by the Modi government. Economic costs of such a move make no sense. Yet the quackery of demonetisation is being sold precisely as the medicine to take care of economic ills. As the chaos due to demonetisation unfolded, and government responded by hastily announcing more than one new rule about bank transactions per day (59 such rules have been announced till 19 Dec, 2016, during 40 days since PM's 8 Nov announcement), it became apparent that no homework and planning was done before throwing the sand of demonetisation in the gears of the economy.

A modern state bound by law, policies and regulations is an important actor of public rationality in society. It is expected to presuppose public scrutiny of its actions, and aid in this scrutiny by providing cogent explanations for its actions. At its minimum, any rationality is bound by an awareness of the objective cause-effect chain. Fascist politics gives precedence to its own internal logic over any public rationality. Without subjecting existing laws, policies and regulations, that  do not agree with its politics to any critical analysis, it easily labels them against the national interest. In India we have seen Hindutva doing this with reference to secularism. Demonetisation and the push for a 'cashless' economy show another aspect of Hindutva, not  directly related to communalism. This is a naked assertion of 'leader's wisdom' over any public reason. The driving logic behind these actions was to appear sufficiently 'bold' to do what has never been even thought before, and to be seen as ready to take a 'tough action' against entrenched interests. Spectacles of these kind need no justifications, they are their own cause, and their very execution is the only measure of their success. We had seen a similar internal logic behind the so called 'surgical strikes' against Pakistan in September. The anti-fascist democratic discourse in the country needs to not only counter claims of such actions, by proving the lack of any success against intended targets, but also explore reasons for the weakness of public opinion against such 'wisdom', and 'boldness'?

The point is public rationality otherwise too is marginal in the public life of India. Religious beliefs, superstitions, and caste, gender, regional and ethnic prejudices thrive not only in private lives, but through publicly organised fairs and functions, education system, entertainment industry, celebrity culture, etc. also dominate public discourse. Politicians of all hues thronging to 'spiritual' babas, swamis, gurus, munis, sect chiefs, etc. before elections is not a cause, but a proof of this domination. A concerted Hindutva strategy is to change the landscape of this domination. This is occurring at two levels. One is the aggression it has brought in to the push for its kind of religiosity. People raising objections against it are actively being hounded and legal cases are being slapped against them. Second is the effort to bring aspects of public life like nationalism, which to some extent have been under public scrutiny, under the rubric of its aggressive non-rationality. The 'demonetisation' and 'cashless society' are the latest  non-questionable beliefs for Hindutva, anyone questioning them is an anti-national according to it. 

The non-fascist aspect of Indian public sphere resides in its, howsoever weak, public rationality and  the diversity of its non-rational belief systems. The latter includes an acceptance of mutual co-existence. Hindutva fascism is attacking this diversity. Its strategy however is classic Brahminical. It is trying to create a hierarchy of non-rationalities in which its own non-rationality enjoys the highest place. While the arguments for mutual co-existence can work against Hindutva attacks on the other religious non-rationalities, with reference to the 'secular' part of its non-rationality a principled public rationality is the only viable alternative. 

State over Society: Changing the character of state power is an important aim of fascism. Despite the formally liberal character of Indian state, there are in fact a number of features of Indian political formation which help fascist politics. A deep rooted assumption of the victimhood and helplessness of people of India runs through its popular political ideology. True, occupants of the political pinnacles of state have to pass through periodic electoral tests, and the country has witnessed a number of popular mobilisations and even armed rebellions. However, none of them have even remotely been able to establish the practice of citizenship of people as rights bearing agents, as the classical liberalism of Indian constitution imagined, or as makers of their own social world, the idea at the core of revolutionary left. In stead, populism is the dominant form of political discourse. Even the 'aspirational classes', products of neo-liberal political economy, which are the main cheerleaders of Mr Modi, see their agency primarily in terms of making good of available economic opportunities, and are not motivated by any political vision. The obverse of the victimhood of people is the non-negotiated legal power of the state over society.

Even if the government of the day has a legal right to withdraw currency notes, the unprecedented move of the Modi government on 7th Nov, without any monetary crisis in sight amounted to a unilateral going back on the promise a currency note gives its bearer. By forcing people to deposit their notes in banks, and allowing only stringent withdrawals under confusing and ever changing rules, it palmed off people's money from their very hands. Modern state does not simply print money and give it to people as a 'social service'. A currency note enters the economic flow as payment by the state to non-state actors for services and goods rendered, or to fulfill its legal obligations. In strictly economic terms, Modi government's step is a legal loot, correctly seen thus by the former PM Dr Manmohan Singh. Yet that is not how even the political opposition to Mr Modi is looking at it. Hardships to common people standing for hours in ATM and bank queues, collapse of informal economy, etc. are highlighted. The immorality of the very act which brought forth these difficulties is rarely the point of criticism.

Indian political ideologies support suspicion of leaders, parties, and governments when a 'scam' for personal benefit is sniffed; not when the state fails to honour its part of the bargain with citizens, or even when it violates its own laws. There is a lack of popular moral compass to judge the state. This weakness of society against state is related to deeper and long term features of Indian society. The failure to 'annihilate caste', as Ambedkar imagined, has meant that a sphere of society wide moral concern has not evolved. This, for instance, is manifest in exceptional levels of every day cruelty. Even many poorer and war torn societies would not countenance the treatment meted out to weak, child workers, old, infirm, and destitute, which is taken as normal in India. It is not surprising that in the moral morass of India, the public immorality of Modi government is little noted.



Moral Rage, Mythology and State Power: Fascism projects itself as a project for moral regeneration. Classic forms of Fascism stoke moral rage against targeted minorities held responsible for real or imagined national failures and humiliations. Myths play an important role in this tactic, as glues to form a particular aggrieved 'people', targeted minorities as figures of Evil, and dreams of national and civilisational greatness.  Even while Modi government's demonetisation does not as a whole fit into the ideal type of a fascist maneuver, its elements come straight out of the script.

In his address to the nation announcing demonetisation, Mr Modi had straightway listed three targets; black money, terrorist funding and counterfeit notes, even while there was little concern for  the impending disruption to everyday economic activities. There was, and is, little evidence of demonetisation affecting these three in any serious way. Yet the moral story behind the step has been sustained in popular discourse because of widely shared myths about black money and corruption. Myths are neither true, nor false. They select and amplify part of a reality, provide frameworks to help make sense of the world, and give common referents for moral judgments. In a rapidly changing economy with gross inequalities, corruption and mass anxieties about the future; the notion of Black Economy performs many functions. Technically it refers to a real sector of the economy with source in corruption, crime and untaxed income. Different estimates of the black wealth in India put it at about 25% of the GDP. Data from income tax raids show that about 95% of this wealth is non-cash, mainly as real estate, gold and different forms of benami financial assets. There are also indications that the major chunk of the unaccounted wealth accumulated by Indians is actually held outside the country. A Global Financial Integrity study of post independence India, puts the latter at 72% of the unaccounted wealth. However, stashed currency notes as fruits of crime and corruption is an old trope in Indian popular culture. The image of notes stashed in pillows, used in 1978 during the demonetisation by Morarji Desai government, has now ballooned to notes stashed in mattresses, the image used by the current government. Recurrent reinforcements are occurring even in the midst of demonetisation drive, in the form of news flashes about stacks of even new notes discovered by Income Tax department. The idea of demonetisation as an attack on corruption has traction in popular imagination because of the displacement in the image of black wealth away from its actual forms to currency notes.

Why are currency notes the most suspicious form of wealth for Indians, despite being the essential fluid for every day market transactions? As a form of wealth, paper currency is abstract and depersonalised. While other forms of black wealth like the real estate, gold, ostentatious display on marriages, etc. have emotional appeals as objects of desire. Capital is wealth/stock in motion. The popular ideology of wealth in India sees it as static. The moral rage against stashed cash, assiduously used by BJP to sell demonetisation, is actually a pre-capitalist hold over.

Like the belief in cash being the prime form of black wealth, popular ideas about generation of this wealth are also very selective. Corruption at high places in governments, which has been the focal point of many popular movements, is actually only one of the sources of black wealth. Huge amounts of untaxed income are created along with legal and regular economic activity by corporates in the form of over-invoicing, round tripping, P note invetments in stocks via Mauritius, shell companies in tax havens, etc. Many of  these practices are integral to the workings of global capitalism. Even US corporates have stashed more than two trillion dollars outside in low tax countries. The recent penalty against Apple, the most profitable company in the history of capitalism, imposed by the European Union is related to its global operations routed through Ireland to avoid paying tax in the US. A big chunk of NPAs lying with Indian public sector banks have also been translated to black wealth. It is a measure of the lack of popular class consciousness about capitalist operations in India, that corruption by high government officials is seen as the prime source of black wealth.

The popular moral judgments on corruption have some unique features making them specifically amenable to populist mobilisations with anti-democratic potential. First is the lack of self reflexivity. It is always the 'other' who is corrupt. The mal-exercise of power of discretion by politicians and high bureaucracy is seen as corruption, but paying household maids less than the minimum wage, or even not paying them their wages with the excuse of lack of currency notes, as is happening in many middle class homes after demonetisation, is not seen as corruption. Second is the 'hush hush' mystery created about corruption, which makes discourses about it similar to soap-operas. Figures beyond imagination are bandied, ('every Indian will get so much if the money from 'this' scam is recovered!', etc.), however directly experienced concrete instances of corruption, the hafta local police charges hawkers, bribes given when a property is registered below its market value, or traffic violations, are not targets of popular discourses on corruption. Third, discourse on corruption confuses symptoms with the cause, and this confusion directly leads to popular allure of a 'strongman/woman' who will clean its dirt. Corruption by state functionaries is a result of lack of democratic accountability; that by corporates and smaller capitalists is a manifestation of power of money over public authority. Focus on particular parties and individuals, rather than systemic causes, opens the way for strongmen/women to walk in claiming instant relief.

Institutional Degradation: Institutional autonomy is a unique feature of liberal mode of governance. It is the life blood of latter's decentered authority structure. The centralising thrust of fascism degrades insitutional autonomies. Despite the last governor Raghuram Rajan's monetarist prejudices, much loved by international finance, the RBI under him was jealous in guarding its turf. Hence it was not surprising that he was forced out by the Modi government at the first opportunity. The new governor, Mr Urjit  Patel was either not taken into confidence on the demonetisation move, or he acquiesced meekly. In either case the autonomy of RBI has been badly mauled. Subsequent to the demonetisation announcement also, the job of forming and announcing new rules regarding restrictions on withdrawals etc. which fell in RBI's jurisdiction, was taken over by finance ministry. The 1978 demonetisation by the Morarji Desai government was implemented through an ordinance. Modi government has done away with even that nicety of parliamentary procedure, and pushed demonetisation through an executive order. As the washout of the recent winter session of the Parliament parliamentary deliberations are the other big casualty.

However, it should be noted that institutional and legislative degradation is a long standing aspect of Indian political formation, which is related to the character of political power in society. From panchayat gram sabhas to the parliament, India has over 2.5 million citizens elected to different state institutions. It is the largest body of elected representatives ever in the history humanity. The expansion and depth of representative institutions have changed the social bases of political power, and is much valued by erstwhile excluded groups. However, this expansion has not made the character of political power more democratic, and even while elected by the peoples, representative bodies lack legitimacy and moral authority in society.  This scenario is ideal for a politician like Mr Modi. The floor of a representative body like the parliament at which a leader has to listen to, or spar with opposition members on an equal footing, and which in the age of direct TV relay is effectively a public arena, is the last place any leader with fascist inclinations would like to be. By speaking on demonetisation in jan sabha, rather than the Lok Sabha, as he claimed in a rally in Surat recently, Mr Modi is only making a virtue out of the dire straits of representative bodies in the country, for his kind of politics.

Class Agenda of Demonetisation and the push for Digital Economy: Fascism claims to be standing up for the entire nation and the people, above fractious sectional interests espoused by other political parties. In an era when the idea of socialism had popular appeal, both Mussolini and Hitler had christened their movements socialist and berated the self interest of high capitalist class as part of the problem. Even the BJP in early eighties had declared its guiding philosophy to be Gandhian Socialism. No flirtation with socialism is needed in the neo-liberal era. Depending upon the society and its history, fascism always has a core of class agenda. This agenda is different from other parties that stand in favour of capitalism, which often is a source of confusion among people. Hatred for the poor and destitute is a complement of fascist aggression for power. This is an element of the ideology of lower middle classes and better off sections of the working classes; in India it is also fortified by caste prejudice. The ideology of the rich and super rich, which are securely separated from the poor, need not have the kind of hatred for the poor often seen in fascist politics.  Other class characters of fascism are attacks on organised labour, and the union of state and big capital.

In India, there is a direct correlation between the class status of an economic agent and the proportion of its market transactions in cash. Hence, working poor are the worst affected by demonetisation. All their market transactions, whether as wages, or daily earnings through petty trading are in cash, and have collapsed as demonetisation has sucked out cash. Small scale and medium enterprises have also suffered. The big capital and high professional classes have come out unscathed.

The exchange of currency notes between a buyer and a seller is costless for both of them. The cost of printing notes is borne by the issuing agency, which factors in this cost within its earnings as the center of finance in the country. The push towards digital transactions is forcing markets from such a very low cost transaction system towards a situation in which banks, digital transaction portals, electronic wallet companies, etc earn a fee from every transaction. It is forcing the system of transaction towards a captive market for corporations selling digital financial services, including consumer finance. The affluent in the country have been moving towards these service providers over many years voluntarily, mainly due to the ease of accessing these services despite their cost. The digital transactions are very different for the poor, who obviously lack cultural and technical resources to access digital transaction portals. Forcing them towards digital transactions through fiat is their state sponsored marginalisation. That the state is  also celebrating this transition, shows how cruelly indifferent it is towards the poor. At the other extreme is the corporate sector, which is waiting in the wings to profit from the forced destruction of the informal sector of the economy. 

Much is being said about the differences between the formal (meaning the state and big capital) and the informal sectors of the economy. The demonetisation discourse looks at it only in terms of the latter being outside the tax net. As a capitalist economy expands, economic enterprises have a tendency to move towards formal transactions for the sake of accessing national and global markets. This is happening in India too, and the process is only getting accelerated. However the significance of formal-informal difference has very different character when looked from the perspective of working classes. For them the key issue is whether the existing laws related to protection of workers' rights, security, health, contract work, minimum wage, provident fund etc. are being followed, or not. In this regard, it is observed that not only the informal sector, but formal sector enterprises too blatantly violate these laws. The big capital and Modi government have little interest in enforcing these laws, their concern is limited to bringing the informal sector within the tax net.   

Demonetisation and push for cashless economy have given a qualitative push to the class agenda of fascist politics. However, it must be noted that this agenda enjoys wider support. At the current juncture in India the class agenda of fascism is actually the same as that of neo-liberalism. All major political parties in the country have accepted the necessity of neo liberal economic order, even though on political and social dimensions there may be differences among them. The weak opposition to demonetisation and the push for digital economy at popular level is a direct consequence of the fact that public life in India is almost completely bereft of class issues, and forces fighting for working people's class interests have not been able to develop a viable political alternative to neo-liberalism.

Conclusion: Fascist project involves deep rooted changes in society and state. Its downward spiral feeds upon its own success and weakens internal forces able to counter it. As examples of Germany and Italy show, once societies get sucked into fascist vortex, it is very difficult to come out of its sinkhole. At stake is not any specific state policy, but the way popular classes imagine the society and their role in it. This requires anti fascist forces to widen and deepen their criticism of all aspects of social life which help fascism. Elements of popular ideologies which disarm people against fascist propaganda need to be identified and addressed urgently.

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Sanjay Kumar teaches Physics at St Stephen's College, Delhi, and is associated with New Socialist Initiative and People's Alliance for Secularism and Democracy.